HOW DO YOU REMEMBER ME

I heard this pretty interesting quotes some time back which says ”There is a truth that is mine and one is yours and then there is a third one which is nobody’s truth!!” and taking this further “we are never villains in our own story.”

I write this because just a few days back I heard about ‘The reason which a friend of mine had told some mutual friends about us drifting apart. It made me wonder how different can two people see things: things that may be inconsequential to one may be the raison d’etre for another. Maybe he had reasons to believe what he believes and I had mine to disbelieve them.

We drifted apart but have been friends though, for I strongly believe in that in life one should never burn their bridges because one’s path will eventually lead you to that bridge that you destroyed. We seldom realize life isn’t too short but rather its toooo long and there are no escaping people , even the ones you abhor, hate and loved and lost especially living in a small town.

We save numbers, add people on FB and follow them on Instagram and the whole rigmarole of reversing this process is difficult. Un-following / Un-friending and blocking serves their purpose but to a point only. They pop-up on mutual friends timelines and then there is stalking which some of us are experts at. The need to stay updated is a strong motivating factor, isn’t ??

Letting go doesn’t happen and why should it?? What if we become friends again?? Do we ignore and look thru each other or do we acknowledge each other. I am the latter variety. The grudge, the hurt will remain forever but so shall my ability to be friendly and civil. Like I said  – NEVER BURN YOUR BRIDGES !!

Till the time I return to the path leading to that illusive bridge, all I want to remember are the good memories and the interesting time we shared and yes there will be exceptions: People and memories that I wish to completely obliterate from my memory and that is a special place reserved for few ultra villains/vamps in my life.

So till them we all become evil in each other’s versions of the truth, let’s remember us in those happy times and let that be our forever memory.

PICHHOLA KA DARD

प्रिय उदयपुरवासियों,

सदियों से मैं आपके इस फलते – फूलते शहर की साक्षी रहीं हूँ

मैं यहाँ तब भी थी जब मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ़ हुआ करती थी. पिछोली गांव के निकट मेरा निर्माण 14वीं शताब्दी में पीछू चिड़िमार बंजारे ने करवाया था और तत्पश्चात महाराणा उदयसिंह द्वितीय ने इस शहर की खोज के बाद मेरा विस्तार किया.

मेरे ही एक द्वीप में बने जगमंदिर में शहज़ादा खुर्रम ने अपने वालिद जहाँगीर से बगावत कर यहाँ 1623-1624 में  पनाह पायी थी, जो आगे चल कर मुग़ल सलतनत के बादशाह शाहजहाँ बने. 1769 में जब माधव राव सिंधिया ने शहर पर आक्रमण किया तब एकलिंग गढ़ की खाइयों में भरे मेरे ही पानी ने आप के पूर्वजों को मराठाओं से सुरक्षित रखा था.

मेरे चारों ओर शहर वासी बसते गए और अपने सुविधा अनुसार मेरा उपयोग और उपभोग करते रहे. मेरी अनेक घाट आपकी कई पीढ़ियों के काम आई इनमें से कुछ अब आपकी पहुँच से बहुत दूर जा चुकी हैं.

कालांतर में समय बदला, राज बदला और साथ आये नए कानून. परिवारों को अपने पुश्तैनी मकान में बढ़ते कुनबे को समाने की जदोजहद करनी पड़ी. एक कमरा या छोटा बदलाव न कर सके. कानून ने उनके हाथ बाँध दिए.

वैसे आज कल मेरे प्रति आप सब का प्रेम देख कर मन प्रफुल्लित हो जाता है. लेकिन फिर सोचती हूँ यह प्रेम तब क्यूँ न जागा जब पर्यटन के नाम पर मेरा दोहन किया गया. आलिशान होटलों का निर्माण कराया गया और व्यवासियों ने कमाई के लिए रोड से ना ले जाकर अपने अतिथियों को मेरे सीने को चीरते हुए अनेक नावें उतार दी. शांत रातों को विलासिता भरे अनेक जलसों की साक्षी आप और मैं भी रहीं हूँ. लेकिन आपका दर्द शायद तब इतना न झलक पाया.

मेरे नाम पर कईयों ने रोटी सेकी : किसी ने हाई कोर्ट में अपनों को बचने के लिए नवीन निर्माण को पुराना बता दिया तो किसी ने शुतुरमुर्ग की तरह अपना मुंह मेरी रेत में छिपा लिया. रसूख और रुतबे के आगे सब जायज़ हो गया जो न हो सका तो बस आम शहर वासी का झील किनारे अपने आशियाने का अपने ज़रूरत के हिसाब से विस्तार.

शिकायत तो मुझे आप से भी है !! मैंने न जाने आपकी कितनी गन्दगी अपने में समा ली है. पहले तो ठीक था लेकिन अब इस बढती आबादी की गन्दगी मेरे लिए साफ़ करना मेरे बस में नहीं.

आशा है की आप मेरे चारों और बसे मंदिरों में शाम की आरती की घंटियाँ सुन मेरे लिए भी एक छोटी सी प्रार्थना ज़रूर करेंगे.

आपकी,

पिछोला झील

Lost Generation

Just the other day I was inquiring about the well being of the family of our office help. Luckily for him and his family they remained unscathed by this recent Corona Wave. However as a father of 2 young boys aged three and five, he was worried in respect to their education. Online classes were something his kids were too young to attend on their own considering he and his wife were working parents and they lacked resources to buy smart phones for them.

What we are looking at is a Lost Generation!! Generations getting lost at both at the starting point as well at the end of the Indian School System.

This pandemic with it has not only bought death and illness but also unparalleled economic misery. Millions have lost their jobs, earnings and have been pushed to poverty. As per a World Bank study the COVID-19 pandemic is estimated to push an additional 88 million to 115 million people into extreme poverty this year, with the total rising to as many as 150 million by 2021.This has a direct bearing on the education of our children.

We are looking at a delay in admission in primary section by at least a year or two as not many parents can afford smart phones for their children for online classes. Even if they do, how many have the inclination and wherewithal to monitor their child’s progress? At such a weak base we are looking at children with issues in future.

Moreover for students who are aiming for a good college- these online classes and economic hardships for some will putting a spanner in their future plans. Getting admitted in college below a student’s potential for lack of affordability of coaching classes / Fees is going to reflect on their Job opportunities and economic status their entire life.

Then there is an entire section of children who have been stopped going to school for lack of funds, to supplement family income or even become breadwinners. Will it be ever possible to get them back to the education system??

There are no easy solutions and not a comfortable path forward. With an imminent third wave in future, this academic year too will be sacrificed at the altar of the pandemic. I just hope I am proved wrong in the future and the future of our children remained unscarred by COVID-19.

नानीजी

दो दिन पूर्व नानीजी अपने भगवान् महावीर के पास हमेशा के लिए चले गए और साथ ही गुज़र गया मेरे बचपन का कुछ हिस्सा और छोड़ गया तो सिर्फ धुंधली ओझल यादें.

मेरे को उनकी पीढ़ी से जोड़ती वह आखरी कढ़ी थी जो हमेशा के लिए खुल गयी.

अब कौन देखेगा हम सब को मोटे से चश्मे के पीछे से घूरते हुए?

कौन प्यार से शब्दों के बाण और ताने मारेगा?

कौन अब कहावतों और लोकोक्तियों की बरसात करेगा. किस से उनका मतलब पूछेंगे ?

कड़क आवाज़ और उतने ही कड़क तेवर. नियम के पक्के और अपने धर्म के प्रति कट्टर. अगर मेरे दादेरे में हर कुछ करने की छुट थी तो गर्मी की छुट्टियों में नानेरे में थोडा अनुशासन सिखाया. अगर दादी ने थाली में झूठा छोड़ने में कुछ नहीं कहा तो नानी ने इस पर सीख दी.

याद रहेगी जेम पैलेस की रोठ तीज, वह रसोईघर के स्टील के डब्बे में भरे आटे की बिस्किट, वह नियम से रात को दूध पीना और वह नाश्ते में बनायीं गयी ताज़ा गरम मठरियां.

शायद मिलेगा अब भी वह सब वहां भी , लेकिन उनको देने वालीं नानी ना रहेंगी.

बचपन में उनके अनुशासन से थोडा डर लगता था लेकिन उनकी सीख अब याद आती है. कोशिश करता हूँ अपने बच्चों में भी वही सब सिखाने की. इस बात का संतोष है मेरी मां अपनी माँ की कॉपी निकली जिससे वही अनुशासन का पाठ मेरे बच्चों को समय-समय पर मिलता रहता है और नानेरे के जैन धर्म से जोड़े रखता है.

नानीजी आप हमेशा याद रहोगे.

सत्ता के साथी

पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री गिरिजा जी व्यास अक्सर अपने भाषण में कहती हैं की किसी ज्योतिष या भोपा ने नहीं कहा था कांग्रेस पार्टी से जुड़ने के लिए. हम कांग्रेसी हैं क्यूंकि हम इस की विचारधारा में विश्वास करते हैं.

हम विश्वास करते हैं उसके सिधान्तों और मूल्यों में. सब की अपनी विचारधारा होती है और होनी भी चाहिए क्यूंकि यह हमारे व्यक्तित्व की पहचान होती है. कोई वामपंथी होता है, कोई संघी और कोई कांग्रेसी. पार्टी से आपकी नाराज़गी हो सकती है लेकिन इस का मतलब यह नहीं की कोई अपनी विचारधारा में पूर्ण बदलाव कर दें.

दशकों से जिस विचारधारा के खिलाफ खड़े रहे उस से एक झटके में कैसे गले लगा सकते हैं. चुनाव में हार जीत लगी रहती है. राजनीती में सब की मह्त्वाकान्शायें होती है लेकिन सत्ता सुख के लिए इस में बदलाव कहाँ तक सही है??

भारतीय संसदीय प्रणाली ब्रिटेन के वेस्टमिनिस्टर मोडल पर आधारित है. वहां पर भी एक समय पर कंजरवेटिव पार्टी 18 साल (1979 – 1997) तक सत्ता पर काबिज़ रही और हार गयी. फिर संघर्ष किया और अब वापस पिछले 10 साल से ज्यादा से पार्टी सत्ता में है और शायद ही वहां के अग्रिम पंक्ति के नेताओं ने सत्ता सुख के लिए अपना पाला बदला हो.

भारतीय राजनैतिक परिवेश में देखें तो ऐसे उदहारण देखने को मिलेंगे की किसी के पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से टकराव रहा हो तो उन्होनें विचारधरा से समझौता नहीं करा , चाहे वह शरद पवार महाराष्ट्र में हों, ममता बैनर्जी बंगाल में या 1996 में कांग्रेस नेतृत्व से अलगाव के कारण पार्टी छोड़ खुद की पार्टी बनाने वाले माधवराव सिंधिया, जी.के.मूपनार और अन्य.

एक प्रमुख कारण जो हाल ही में विपक्षी पाले में जाने वाले नेताओं ने बतलाया है की वह जनता की सेवा करने के लिए ऐसा मजबूर हो गए थे. यह सरासर झूठ है और सत्तानशीं होने के सिवा कुछ नहीं. अगर जनता की सेवा करने ही है तो आपको सत्ता की कोई ज़रुरत नहीं. इस कोरोना काल में ही देख लें तो यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बी.वि.श्रीनिवास, तहसीन पूनावाला को या सोनू सूद को. कोई सत्ता में नहीं था, पुलिसिया कार्यवाही करी गयी उन पर फिर भी इस दूसरी लहर में जनता की सेवा के लिए झुझते रहे. जैसे की किसी ने सही लिखा है –

कुछ कर गुजरने के लिए, मौसम नहीं मन चाहिए

साधन सभी जुट जायेंगे, संकल्प का धन चाहिए

जिन नेताओं ने पाला बदला है उनके पास सेवा के लिए संसाधन की कमी तो बिलकुल नहीं थी. कमी थी तो केवल अपनी विचारधारा पर तटस्थ रहने की और जो चीज़ भरपूर थी वह थी सत्ता की भूख और खुद की  राजनैतिक मंशा पूरी करने की.

2014 से जब से एक विचारधारा की पार्टी सत्ता में आई है उनका एक मात्र रास्ता चुना है सत्ता में बने रहने का और उन का बढ़चढ़ का साथ दिया है कुछ एक नेताओं ने.

तो इसलिए अब वक़्त आ गया है की सब राजनैतिक व्यक्ति आत्म-मंथन कर लें की उनके लिए क्या ज़रूरी है विचारधारा या सत्ता क्यूंकि हम सच्चे कांग्रेस जन तैयार हैं लम्बे संघर्ष और लड़ाई के लिए.

Bye Bye 2020

Queen Elizabeth once said, “1992 is not a year on which I shall look back with undiluted pleasure. In the words of one of my more sympathetic correspondents, it has turned out to be an annus horribilis.

Annus horribilis is a Latin phrase, meaning “horrible year” and being a major fan of the Series – The Crown, I wouldn’t want to miss the opportunity of quoting her majesty – as I feel the same about 2020.

2020 has been one hell of a horrible year for mankind. A virus has taught us how insignificant and ignorant we have been. Irrespective of the advances by the scientific community they have been a step behind the forces of Mother Nature. COVID-19 – A virus that put the world at a standstill: A scenario we never envisioned in our wildest dreams.

But aren’t we all glad this year is finally getting over and with the hope of getting ourselves vaccinated soon enough. YES!! Irrespective what the naysayers may say I am going to get myself vaccinated as soon as I can lay my hands / bum whichever way it’s going to be administered on.

Before this year ends lets pray for the ones we have lost or whose life have been scarred by this deadly disease. Loss of family, friends, jobs and incomes wrecked all of us emotionally.

On the flip side let us thank God for making us sail thru this year alive!! We will heal at our own pace, for that is the human spirit – To Fall, To Stumble and To Rise Again. We will be the living embodiment of the Pandemic tales that we shall regale our future generations with.

Lets us drown the unpleasant memories of 2020 in the festive spirits of our choice and usher in a promising 2021!!

God Bless us all !!

Bollywood

Most of you who know me personally or follow me on social media would know my love for films.

I have thrived on watching films over the 4 decades of my being. This love affair that started with Hindi Films aka Bollywood and has taken me to Hollywood to Regional Cinema and to World Cinema thanks to the advent of sub-titles.

Hindi Films i.e. Bollywood shall forever remain my first love. For they have made me happy and sad, made me question and also made me hate, all with equal measures. Their music is the only one that I can comprehend for they tap into each emotion and occasion.

Besides the movies the people that light up the silver screen and those who enable them have been inspired entire generations. They have been there to serve the nation: the case in point being actors who have gone to the frontiers to boast the morale of our Jawans amongst others.

However my heart pains when some sections of the media goes on to paint the entire industry as the den of all vices. The industry has some issues but isn’t these matters that plague our society irrespective of the industry. The film industry is an easy target and scapegoat, for there is too much money and lives at stake. One bad weekend can be death knell for a film. Targeting films and their actors makes for good politics and that’s what we are seeing these days.

Sensationalising news on Film Industry makes for good TRP’s. Look what has happened to a particular news network that have been garnering substantial eyeballs and thus filling in their coffers. Like in all other matters they are the Prosectutor, Judge and Jury all rolled in to one.

Well sorry for using the “roll” word, for Rhea has been put in jail for rolling things she shouldn’t have and for that matter no middle-class person should have, after all these are things only the rich and famous do and not us.

For the Film Industry I hope this crisis gives you time to put your house in order or what the hell, Wait !!

People have very–very short memories they are going to come back to watch movies of the very people who are now being shamed and disliked. Till that short time work on good scripts and take us back to the magic of a dark Cinema Halls and lit-up Silver Screens !!

रुक जाना नहीं तू कहीं हार के, काँटों पे चलके मिलेंगे साये बहार के…..

66 Years Later

Rajasthan

1954  

श्री जयनारायण जी व्यास राजस्थान की राजनीती में शीर्षस्थानीय, सर्वोपरि अडिग चट्टान थे. लेकिन राजस्थान की राजनीती में उनके प्रयोग प्रदेश कोंग्रेस को न तो स्वीकार थे न सहन थे. इसलिए सन 1954 में राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी की जयपुर में होने वाली बैठक में, जिसमें खचाखच भीड़ थी, श्री माणकयलालजी जी वर्मा ने एका-एक उठकर कहा, “आज से व्यास जी , मैं आपकी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करता हूँ. आप भी हीरालाल जी शास्त्री जी के रास्ते जा रहे हैं. कांग्रेस की बात आप मानना नहीं चाहते, यह चल नहीं सकता. आपका नेतृत्व कांग्रेस की हथेलियों पर है.”

व्यास जी यह कहकर सभा से चले गए, “तो ले लो तुम लोग मिनिस्ट्री …..”

6 नवम्बर 1954 को श्री जयनारायण जी व्यास विधान सभा में कांग्रेस पार्टी की बैठक में 8 वोट से हार गए और श्री मोहनलाल जी सुखाड़िया नए नेता निर्वाचित हुए. 13 नवम्बर 1954 को, सात दिन बाद राजप्रमुख ने उन्हें मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई. और इस तरह मात्र ३८ की उम्र में राजस्थान में लोकतंत्र वाद ने सुखाड़िया युग का शुभागमन हुआ.

2020

66 साल बाद कुछ ऐसा ही विरोध राजस्थान में फिर दिखाई दिया. जहाँ पहले यह विरोध 55 साल बनाम 38 का था, इस बार यह 69 साल बनाम 43 का है.

जहाँ पहले मारवाड़ से दिग्गज लोकनायक श्री जयनारायण जी व्यास ने मुख्यमंत्री पद से रुखसत की थी ठीक उस के विपरीत इस बार मारवाड़ से ही जननायक श्री अशोक जी गहलोत ने अपना एक बार फिर सभी कोंग्रेस विधायकों के समर्थन प्राप्त कर लिया. आलाकमान के हस्तक्षेप के बाद विरोध थम गया. एक महीन के अंतराल और व्यथित करने वाले घटनाक्रम में स्थितियां अब शांत हो गयीं

हम कांग्रेस जन ने आज चैन की सांस ली है, विपक्ष की सरकार गिराने की कोशिश को पूर्णविराम लगा दिया गया है. सरकार फिर से आम जन के हक में और अपने वायदा पुरे करने के मार्ग पर अग्रसर हो गयी है. 2023 तक की चुनी हुई राजस्थान की जनता को समर्पित कांग्रेस सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी, यह हम सब का विश्वास ही नहीं बल्कि पूरा यकीन है.

जय कांग्रेस !!

Jai Siya Ram

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आप सभी को राम मंदिर के शिलान्यास पर बहुत बहुत बधाइयाँ.

2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसला मंदिर के हक में दे कर, हमेशा के लिए इस विवाद पर विराम लगा दिया. कल उसी राह में आगे बढकर आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने मंदिर का शिलान्यास कर अरबों लोगों की आस्था और आकान्शा पूरी कर दी.

इसी के साथ लगभग 500 साल के क्रूर खुनी इतिहास का अंत हुआ. जो बीत गया सो बीत गया अब आगे की सोच. लेकिन शायद कुछ अति उत्साहित लोग इस जीत में भी दुसरे का उपहास करने से नहीं रोक पाए. मेरे एक फेसबुक मित्र को ले लीजिये दो दिन पूर्व मेरी एक पोस्ट पर कमेंट करते हुए लिखा की “Biggest day tday ram mandir ka shilanyas hai bhai sb uski badhai do” !!

हो सकता है यह एक बिना सोची समझी ऐसी ही टिपण्णी हो या मैं खुद ही इस का ज़रूरत से ज्यादा मतलब निकाल रहा हूँ, लेकिन आज उन्हीं के तरह बहुत लोग हैं जिनकी यह धारना बन गयी है की मेरी राजनैतिक विचारधारा मुझे इस भव्य मंदिर की शुभकामनाएं देने से रोकती है. यह मंदिर किसी विचारधारा के होने या न होने से नहीं बल्कि न्यायपालिका द्वारा सोचा-समझा फैसले के तहत संभव हुआ है. अगर किसी के मन में कोई भी संशय रहा होगा वह 9 नवम्बर 2019 से हमेशा के लिए ख़त्म हो जाना चाहिए था.

मेरी आस्था और मेरे भगवान् मेरे अपने हैं, दुनिया को दिखने के लिए नहीं. यह बात अलग है की सोशल मीडिया पर मैं कई बार इन के पोस्ट डालता हूँ लेकिन ऐसी पोस्ट डालने और ना डालने से मेरे धर्म और आस्था में कोई फरक नहीं पड़ता.

आज ऐसा माहौल बन गया है की हम सब को अपनी आस्था / अपना धर्म अपने साथ ले कर नुमाइश करनी पड़ती है की जैसे कोई प्रतियोगिता चल रही है की मुझसे बेहतर हिन्दू कौन ?? और यह अब हर धर्म अनुयायिओं पर लागु होता है.

पिछले कुछ दिनों से मीडिया समूह अयोध्या में डेरा डाले हुए थे और वहां से सीधा प्रसारण कर रहे थे. एक व्यक्ति जो की काले चश्मे पहने हुए था का इंटरव्यू लेते समय टीवी एंकर ने मज़ाक में उस से पूछा की यह काले चश्मे फोटोक्रोमेटिक (धूप में जो काले हो जाते हैं) हैं क्या , तो वह बोले की वह हमेशा काले ही चश्मे पहनते हैं !!

यही हाल कुछ लोगों का हो गया है की वह एक ही चश्मे से आठों पहर देखना चाहते हैं जो उनके दृष्टिकोण को संकीर्ण बना के रख देता है.

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् |

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् |

अर्थात् : यह मेरा है ,यह उसका है ; ऐसी सोच संकुचित चित्त वोले व्यक्तियों की होती है; इसके विपरीत उदारचरित वाले लोगों के लिए तो यह सम्पूर्ण धरती ही एक परिवार जैसी होती है |

चलिए हम सब प्रतिज्ञा ले एक शांत, समृध और सौहार्द से परिपूर्ण भारत की.

जय सिया राम !!

IMMUNITY

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Dear Doctor,

I am taking the following for COVID prevention.

Yoga + Walk + Lemon Water + Turmeric powder in water + chayvanprash + Kachha Garlic + Kachha Ginger + Almond Kabuli + Anzeer Kabuli + Khurmani + Kali mirch + Laung in the mouth + Gargles of hot water and salt  + Drinking hot water only full day + Tulsi Batti ( Patanjali )+ Giloi batti ( Patanjali ) + Neem  Batti ( Patanjali ) + Arsenic Albs Homeopethic Medicine 5 drops in two spoons of water 5 days a month + Camphor 1M tablets plus HCQ plus azithral plus ivermectin.

Please suggest if I should take anything more.

Doctor’s Reply :: बस कर पगले, वरना तु अमर हो जाएगा !

Well above is a whatsapp forwarded message and in the real world the patient is me and the Doctor is my wife, who is now sick and tired of trying on any new medicine to boast immunity!!

So कोरोना काण्ड हुआ and it had me shit scared with waves of varied feelings hitting me one after another. पहले थोड़ा defiant होने का ढोंग करा और उदयपुर में positive cases आने के बाद वोह ढोंग भी हवा हो गया. फिर डरना चालू करा तो बेहतर recover rate रेट और vaccine की खबर सुन कर फिर थोड़े चौड़े घुमने लगे ही थे और शहर में कोरोना विस्फोट हो गया. 3 महीने के बाद इसी अच्छी-बुरी खबर के साथ जीना सिख रहे हैं.

The one thing that remained unchanged was the need to boost immunity, but again immunity doesn’t hadownload (16)ve a barometer by which it can measured. To measure when one needs it and when one needs to discontinue the supplements. Well I for one ensured most of my family members lived by the maxim: Better Safe than Sorry!!

Thus the need to boost immunity started with me calling up my Ayurvedic medicine sources luckily for me and unluckily for my members who became unwilling guinea pigs on this quest of boosting immunity, one of our neighbours runs an Ayurvedic Medicine Store.

download (17)So the first dose of immunity started in the month of March with some immunity syrups. Then came Rajiv Bajaj’s famous whatsapp messages about the benefits of Homeopathy and thus we all took the CAMPHORA – 1.

Because of the lockdown the immunity syrups were in short supply and I needed the daily immunity boosters thus came the homemade bitter powder: a concoction of God knows how many dry spices to be taken once a day.

I wanted more so I pestered and pestered my neighbor and who suggested some kind of Chaywanprash, the taste of which I have abhorred since my school days. But क्या करें, कोरोना के लिए वोह भी खाया and finally he had to tell me, बस भैया इससे ज्यादा किसी और चीज़ की ज़रुरत नहीं है!!

Besides the above there was lukewarm water, allopathic self-medication for even a slight deviance from the normal, less intake of cold-substances, washing hands, sanitizer, baths etc. etc…

Anything to keep this Corona at an arms’s distance or like they say 2 गज दूर.

सोच रहा हूँ की अब भी कुछ गड़बड़ हो गयी तो किसी आश्रम में शरण ले लूँगा !!

GO CORONA GO !!